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Jung e Siffin - Haq-Baatil aur Momin-munafeqeen ki jung in hindi

                जंग ए  सिफ़्फ़ीन                   - हक़ और बातिल की जंग  जंग ए सिफ़्फ़ीन इस्लामी तारीख़ की वो जंग है जिसने मुसलमानों के बीच हक़ - बातिल और मोमिन - मुनाफिक़ीन के फ़र्क़ को साफ़ कर दिया।   साल 657 ईस्वी में जब तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा की शहादत हो गयी और उम्मत ने हज़रत अली  रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा को चौथा ख़लीफ़ा चुन लिया, तब शाम यानी आज का सीरिया के गवर्नर मुआविया बिन सुफ़ियान ने हज़रत उस्मान के क़ातिलों को पकड़ने का मुतालबा हज़रत अली से करने लगा, जबकि हज़रत अली का कहना था कि असली मुज़रिम को पकड़ने के लिये थोड़ा वक़्त चाहिए , लेकिन मुआविया बिन सुफ़ियान इस कदर अपनी ज़िद पे आ गया और उसने हज़रत अली से जंग करने का इरादा बना लिया।   फरात नदी के किनारे सिफ़्फ़ीन के मैदान में ये दोनों फौजे टकराने वाली थी।  जंग की शुरुआत प्यास से हुई जब मुआविया की फौज ने फरात नदी पे कब्ज़ा कर लिया और हज़रत अली के लश्करों के लिए पानी बंद कर दिया।  हजरत अली के सिपहसालार ...

इस्लाम में खूनी-रिश्तों का महत्त्व

  इस्लाम में खूनी-रिश्तों का महत्त्व   Importance of Blood-relations in Islam - in Hindi दोस्तों,  खूनी-रिश्तें  वो रिश्ते होते है जो खून के जरिये बनते है, यानी जन्म से ही, जैसे माता-पिता, बच्चें, भाई-बहन, दादा-दादी आदि। खूनी-रिश्तें विवाह या अन्य कोई कारण से नहीं बल्कि जन्म से बनते है।   अगर देखा जाये तो ये जो खूनी-रिश्तें होते है वो इंसान नहीं बनाते, ये रिश्ते खुदा  है, जैसे किसी बच्चे के कौन माता-पिता, बच्चें, भाई-बहन, दादा-दादी आदि होंगे वो बच्चा खुद नहीं बनता बल्कि ये रिश्तें तो खुदा खुद ही बना कर बच्चे को दुनिया में भेजता है।  इसी तरह अगर कोई व्यक्ति चाहे कि वो अपने लिए लड़का या लड़की को जन्म दे तो वो भी इंसान के बस में नहीं है तो भी खुदा ही तय करता है है कि किस व्यक्ति को लड़का देना है और किस व्यक्ति को लड़की देना है और किस व्यक्ति को दोनों देना है और किस  व्यक्ति को कुछ भी नहीं देना है, ये सारे फ़ैसले खुदा खुद करता है। इसलिए ये कहना उचित होगा कि  जो भी खूनी-रिश्तें होते है वो खुदा ही बनाते है।   वैसे तो खूनी-रिश्तों का महत्त...