जंग ए सिफ़्फ़ीन - हक़ और बातिल की जंग जंग ए सिफ़्फ़ीन इस्लामी तारीख़ की वो जंग है जिसने मुसलमानों के बीच हक़ - बातिल और मोमिन - मुनाफिक़ीन के फ़र्क़ को साफ़ कर दिया। साल 657 ईस्वी में जब तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा की शहादत हो गयी और उम्मत ने हज़रत अली रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा को चौथा ख़लीफ़ा चुन लिया, तब शाम यानी आज का सीरिया के गवर्नर मुआविया बिन सुफ़ियान ने हज़रत उस्मान के क़ातिलों को पकड़ने का मुतालबा हज़रत अली से करने लगा, जबकि हज़रत अली का कहना था कि असली मुज़रिम को पकड़ने के लिये थोड़ा वक़्त चाहिए , लेकिन मुआविया बिन सुफ़ियान इस कदर अपनी ज़िद पे आ गया और उसने हज़रत अली से जंग करने का इरादा बना लिया। फरात नदी के किनारे सिफ़्फ़ीन के मैदान में ये दोनों फौजे टकराने वाली थी। जंग की शुरुआत प्यास से हुई जब मुआविया की फौज ने फरात नदी पे कब्ज़ा कर लिया और हज़रत अली के लश्करों के लिए पानी बंद कर दिया। हजरत अली के सिपहसालार ...
गुस्सा (क्रोध) के बारे में इस्लाम क्या कहता है ? what Islam says about Anger ? Image for representation only दोस्तों, इन्सान को गुस्सा आना बहुत आम बात है, आजकल इंसान ज़रा ज़रा सी बात पर बहुत गुस्सा दिखाने लगता है और वो गुस्से में बड़े छोटे का लिहाज़ भी भूल जाता है, और कभी कभी इंसान गुस्से में वो गलती कर देता है जिसका उसको जीवन भर पछतावा होता है । इसलिए आइये जानते है कि ग़ुस्से (क्रोध) के बारे में इस्लाम क्या कहता है ? हज़रत अबु हुरैरा (रज़ि अल्लाहो ताला अन्हा) से रिवायत है कि एक शख्श ने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अर्ज़ किया, मुझे आप कोई नसीहत फ़रमा दीजिये तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि "गुस्सा न किया कर, उसने कई बार यही सवाल किया और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यही फ़रमाया कि गुस्सा न किया कर" । सही बुखारी (६११६ ) इंसान जब बह्स करता है तो गुस्सा और बढ़ जाता है । इसी लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया किः “मैं उस व्यक्ति के लिए जन्नत में एक घर...