जंग ए सिफ़्फ़ीन - हक़ और बातिल की जंग जंग ए सिफ़्फ़ीन इस्लामी तारीख़ की वो जंग है जिसने मुसलमानों के बीच हक़ - बातिल और मोमिन - मुनाफिक़ीन के फ़र्क़ को साफ़ कर दिया। साल 657 ईस्वी में जब तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा की शहादत हो गयी और उम्मत ने हज़रत अली रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा को चौथा ख़लीफ़ा चुन लिया, तब शाम यानी आज का सीरिया के गवर्नर मुआविया बिन सुफ़ियान ने हज़रत उस्मान के क़ातिलों को पकड़ने का मुतालबा हज़रत अली से करने लगा, जबकि हज़रत अली का कहना था कि असली मुज़रिम को पकड़ने के लिये थोड़ा वक़्त चाहिए , लेकिन मुआविया बिन सुफ़ियान इस कदर अपनी ज़िद पे आ गया और उसने हज़रत अली से जंग करने का इरादा बना लिया। फरात नदी के किनारे सिफ़्फ़ीन के मैदान में ये दोनों फौजे टकराने वाली थी। जंग की शुरुआत प्यास से हुई जब मुआविया की फौज ने फरात नदी पे कब्ज़ा कर लिया और हज़रत अली के लश्करों के लिए पानी बंद कर दिया। हजरत अली के सिपहसालार ...
क्या हम एक साथ दो नमाज़ अदा कर सकते है ? अशराइन और मग़रिबैन दोस्तों, इस्लाम में दो प्रमुख फ़िरक़े है शिया और सुन्नी। और दोनों अलग अलग तरह से नमाज़ पढ़ते है। शिया फ़िरक़े में अक्सर वो ज़ोहर और असर की नमाज़ को एक ही वक़्त में अदा कर लेते है जिसको ज़ोहराएँ या अशराइन कहा जाता है इसी तरह वो लोग मग़रिब और ईशा की नमाज़ को भी एक ही वक़्त में मिलाकर अदा कर लेते है जिसको मग़रिबैन कहा जाता है। जबकि सुन्नी लोग पांच वक़्त की नमाज़ अलग अलग वक़्त पे ही अदा करते है। क्या सुन्नी लोग भी एक साथ दो नमाज़ अदा कर सकते है ? बहुत से सुन्नी, जब शिया को एक साथ दो नमाज़ अदा करते देखते या सुनते है तो उनके भी मन में आता है कि जब अक्सर मशरूफियत की वज़ह से वक़्त नहीं मिल पाता तो वो सोचते है कि क्या सुन्नी लोग भी एक साथ दो नमाज़ अदा कर सकते है। अगर वो किसी सुन्नी उलेमा या मौलाना से ये सवाल पूछने जाते है तो उनको मौलाना की तरफ से साफ़ माना कर दिया जाता है कि वो एक साथ दो नमाज़ अदा नहीं कर सकते है और वो मायूस होकर घर लौट आते है। ये अक्सर देखा गया है कि बहोत से सुन्नी जब उनको मशरूफि...