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Sahaba Iqram ki vo Haqeeqat jo aksar Molvi bayan nahi karte hai

  Sahaba Iqram ki vo Haqeeqat jo aksar Molvi bayan nahi karte hai सहाबा इक़राम की वो हकीकत जो अक्सर मौलवी बयान नहीं करते है।   दोस्तों, आपलोगों ने भी अक्सर मौलवी के बयान  में सहाबा इक़राम रज़ि० का बयान सुना होगा और मौलवी जब बयान करते है तो ऐसे बायां करते है कि सहाबा इक़राम एकदम मासूम हो और उनसे कभी कोई गलती हुई ही नहीं हो और सबके सब जन्नती है।  लेकिन क्या हमने कभी ये जानने की कोशिश किया कि क़ुरआन और हदीस ए नबवी में इनके बारे में क्या लिखा है।   सबसे पहले ये जानते है कि इस्लाम की सबसे बड़ी किताब जिसमें अल्लाह का फ़रमान है यानी क़ुरआन शरीफ़ में सहाबा इक़राम रज़ि० के बारे में क्या लिखा है। इसके लिए हमको सूरह तौबा की आयत नंबर 100 पढ़ते है।   The Repentance (9:100)  وَٱلسَّـٰبِقُونَ ٱلْأَوَّلُونَ مِنَ ٱلْمُهَـٰجِرِينَ وَٱلْأَنصَارِ وَٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُم بِإِحْسَـٰنٍۢ رَّضِىَ ٱللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا۟ عَنْهُ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى تَحْتَهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۚ ذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ ١٠٠ As...

क्या हम एक साथ दो नमाज़ अदा कर सकते है ? अशराइन और मग़रिबैन - Ashrain & Maghribain



क्या हम एक साथ दो नमाज़ अदा कर सकते है ? अशराइन और मग़रिबैन 

दोस्तों,

इस्लाम में दो प्रमुख फ़िरक़े है शिया और सुन्नी।  और दोनों अलग अलग तरह से नमाज़ पढ़ते है।  शिया फ़िरक़े में अक्सर वो ज़ोहर और असर की नमाज़ को एक ही वक़्त में अदा कर लेते है जिसको ज़ोहराएँ या अशराइन कहा जाता है इसी तरह वो लोग मग़रिब और ईशा की नमाज़ को भी एक ही वक़्त में मिलाकर अदा कर लेते है जिसको मग़रिबैन कहा जाता है।  जबकि सुन्नी लोग पांच वक़्त की नमाज़ अलग अलग वक़्त पे ही अदा करते है।  

क्या सुन्नी लोग भी एक साथ दो नमाज़ अदा कर सकते है ?

बहुत से सुन्नी, जब शिया को एक साथ दो नमाज़ अदा करते देखते या सुनते है तो उनके भी मन में आता है कि जब अक्सर मशरूफियत की वज़ह से वक़्त नहीं मिल पाता तो वो सोचते है कि क्या सुन्नी लोग भी एक साथ दो नमाज़ अदा कर सकते है।  अगर वो किसी सुन्नी उलेमा या मौलाना से ये सवाल पूछने जाते है तो उनको मौलाना की तरफ से साफ़ माना कर दिया जाता है कि वो एक साथ दो नमाज़ अदा नहीं कर सकते है और वो मायूस होकर घर लौट आते है।  ये अक्सर देखा गया है कि बहोत से सुन्नी जब उनको मशरूफियत की वज़ह से वक़्त नहीं मिलता तो वो अपनी फ़र्ज़ नमाज़ कज़ा (छोड़) देते है।  

क्या इस्लाम में क़ुरान और हदीस की रौशनी में एक साथ दो नमाज़ अदा करने का हुक्म किया गया है ?

दोस्तों ये बहोत ही अफ़सोस के साथ बताना पढ़ता है कि हमारे बहोत से सुन्नी मौलाना इस मामले में झूठ बोलते है और लोगों की नमाज़ कज़ा करवाते है।  क्योंकि जब हम क़ुरान और हदीस को पढ़ते है तो उसमे तो कुछ और पता चलता है।  आईये अब हम इस मामले में कुरान और हदीस का जायज़ा लेते है।  

सबसे पहले हम सूरह निशा की आयत नंबर 103 पढ़ते है, जिसमे अल्लाह ताला ने फ़र्ज़ नमाज़ अदा करने का हुक्म दिया है :

The Women (4:103) 

فَإِذَا قَضَيْتُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ قِيَـٰمًۭا وَقُعُودًۭا وَعَلَىٰ جُنُوبِكُمْ ۚ فَإِذَا ٱطْمَأْنَنتُمْ فَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ كَانَتْ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ كِتَـٰبًۭا مَّوْقُوتًۭا ١٠٣

When the prayers are over, remember Allah—whether you are standing, sitting, or lying down. But when you are secure, establish regular prayers. Indeed, performing prayers is a duty on the believers at the appointed times.

फिर जब तुम नमाज़ पूरी कर लो, तो खड़े और बैठे और लेटे (प्रत्येक स्थिति में) अल्लाह को याद करते रहो और जब तुम भयमुक्त हो जाओ, तो (पहले की तरह) नमाज़ क़ायम करो। निःसंदेह नमाज़ ईमान वालों पर निर्धारित समय पर फ़र्ज़ की गई है।

Holy Quran: 4-103

इस आयत  में अल्लाह ताला ने फ़र्ज़ नमाज़ अदा करने का हुक्म दिया है।  


अब हम क़ुरान की सूरह इशरा जिसको हम सूरह इस्राईल के भी नाम से जानते है उसकी आयत नंबर 78 पढ़ते है, जिसमे अल्लाह ताला ने 3 वक़्त नमाज़ अदा करने के बताये है :

The Night Journey (17:78) 


أَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ لِدُلُوكِ ٱلشَّمْسِ إِلَىٰ غَسَقِ ٱلَّيْلِ وَقُرْءَانَ ٱلْفَجْرِ ۖ إِنَّ قُرْءَانَ ٱلْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًۭا ٧٨

Observe the prayer from the decline of the sun until the darkness of the night and the dawn prayer, for certainly the dawn prayer is witnessed ˹by angels˺.

सूर्य के ढलने से रात के अँधेरे तक नमाज़ क़ायम करें, तथा फ़ज्र की नमाज़ भी (क़ायम करें)। निःसंदेह फ़ज्र की नमाज़ (फ़रिश्तों की) उपस्थिति का समय है।

Holy Quran: 17-78

ऊपर लिखी आयत में अल्लाह ताला ने सूरज के निकलने, सूरज के ढलने और सूरज के डूबने के वक़्तों में नमाज़ों को अदा करने को बताया है यानि कि तीन वक़्त बताया है नमाज़ अदा करने का।  


अब हम जानेंगे कि क्या हदीसों में भी एक साथ दो नमाज़ अदा करने का हुक्म किया गया है या नहीं ?

सबसे पहले हम मुस्लिम शरिफ की हदीसों को देखेंगे,  और अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, इबनेमाजा, मौता इमाम मालिक, और बुखारी शरीफ की भी हदीस देखेंगे। इनसब हदीसों से साफ़ पता चलता है कि नबी सल्लाहों अलैहि वसल्लम ने नमाज़ों को मिलाकर भी अदा की है।  

وَحَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، وَعَوْنُ بْنُ سَلاَّمٍ، جَمِيعًا عَنْ زُهَيْرٍ، - قَالَ ابْنُ يُونُسَ حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، - حَدَّثَنَا أَبُو الزُّبَيْرِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ صَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الظُّهْرَ وَالْعَصْرَ جَمِيعًا بِالْمَدِينَةِ فِي غَيْرِ خَوْفٍ وَلاَ سَفَرٍ ‏.‏ قَالَ أَبُو الزُّبَيْرِ فَسَأَلْتُ سَعِيدًا لِمَ فَعَلَ ذَلِكَ فَقَالَ سَأَلْتُ ابْنَ عَبَّاسٍ كَمَا سَأَلْتَنِي فَقَالَ أَرَادَ أَنْ لاَ يُحْرِجَ أَحَدًا مِنْ أُمَّتِهِ ‏.‏


Ibn 'Abbas reported: The Messenger of Allah (ﷺ) observed the noon and afternoon prayers together in Medina without being in a state of fear or in a state of journey. (Abu Zubair said: I asked Sa'id [one of the narrators] why he did that. He said: I asked Ibn 'Abbas as you have asked me, and he replied that he [the Holy Prophet] wanted that no one among his Ummah should be put to [unnecessary] hardship.)

इब्न अब्बास ने बताया: अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने बिना किसी डर या यात्रा की स्थिति के मदीना में दोपहर और दोपहर की नमाज़ एक साथ अदा की। (अबू जुबैर ने कहा: मैंने सईद [कथावाचकों में से एक] से पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया। उसने कहा: मैंने इब्न अब्बास से पूछा जैसा आपने मुझसे पूछा है, और उसने उत्तर दिया कि वह [पवित्र पैगंबर] चाहते थे कि उनकी उम्मत में से किसी को भी [अनावश्यक] कठिनाई में न डाला जाए।)

Sahih Muslim, Hadees number. 1628 to 1635 / International Hadees Number : 705a 

Sahi Muslim Hadees No. 1633, Abu Daud Hadees No.1211, Jame Tirmizi Hadees No. 187, Ibne Majah Hadees No. 1069, Muwatta Malik Hadees No. 204, Bukhari -543 & 562


ऊपर लिखी गयी सारी हदीसों के नंबर दिये गए है, जो शक्श भी पढ़ना चाहे तो वो इन सभी हदीसों को पढ़ सकता है और ये सभी सही (Authentic) हदीसें है।  इनसब हदीसों से साफ़ पता चलता है कि नबी सल्लाहों अलैहि वसल्लम ने नमाज़ों को मिलाकर भी अदा की है। और इसी हदीस को आगे पड़ेंगे तो, उसमे एक सहाबी  अल्लाह के रसूल (ﷺ) से पूछते है कि उन्होंने ये अमल क्यों किया तो  रसूलल्लाह (ﷺ) ने कहा ताकि उम्मत को आसानी हो।  लेकिन आजके मौलवियों ने दीन को बहुत मुश्किल बना दिया है।  


ऊपर दिए गए क़ुरान की आयतों और हदीसों को पढ़ने के बाद ये बात बिलकुल साफ़ हो जाती है कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने अक्सर एक वक़्त में दो नमाज़ों को मिलाकर अदा  की है यानी ज़ोहर और अस्र (ज़ोहराइन) को मिलाकर पढ़ी है और मग़रिब और ईशा (मग़रिबैन) को मिलाकर भी नमाज़ अदा की है।  और पाँचो नमाज़ों को उनके वक़्त पर भी अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने अदा की है।  लेकिन बेहतर ये है कि अगर वक़्त है तो नमाज़ों को उसके वक़्त पर ही अदा की जाये लेकिन अगर मशरूफियत या कोई और वजह हो तो नमाज़ो को मिलाकर भी अदा कर सकते है।  


आखिर, सुन्नी मौलाना लोग, आम सुन्नी मुस्लिमों को एक वक़्त में दो नमाज़ों को मिलाकर पढ़ने से क्यों रोकते  है?

अब सवाल ये उठता है कि जब अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने एक वक़्त में दो नमाज़ों को मिलाकर अदा  की है तो ये मौलाना लोग सुन्नी मुस्लिम को एक वक़्त में दो नमाज़ों को मिलाकर पढ़ने से क्यों रोक रहे है? दरअसल, ये सुन्नी मौलाना, शिया मुस्लिम के बुग्ज़ में नमाज़ों को मिलाकर पढ़ने से रोक रहे है।  इन सबका अलग-अलग फ़िरक़ा है और फ़िरक़ा-वारीअत के चक्कर में अपनी राय को क़ुरान और हदीस के ख़िलाफ़ लोगों को बताते है।  


निष्कर्ष :

क़ुरान और हदीस से साफ़ पता चलता है कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने अक्सर एक वक़्त में दो नमाज़ों को मिलाकर अदा  की है यानी ज़ोहर और अस्र (ज़ोहराइन) को मिलाकर पढ़ी है और मग़रिब और ईशा (मग़रिबैन) को मिलाकर भी नमाज़ अदा की है।  और पाँचो नमाज़ों को उनके वक़्त पर भी अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने अदा की है।  इसलिए एक आम सुन्नी मुस्लिम भी एक वक़्त में दो नमाज़ों को मिलाकर अदा कर सकता है, इसमें कोई गुनाह नहीं है और दो नमाज़ो को मिलाकर पढ़ना जायज़ है।  लेकिन बेहतर ये है कि कोशिश करे अगर वक़्त है तो नमाज़ों को उसके वक़्त पर ही अदा की जाये, क्योकि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने आम तौर पर नमाज़ों को उनके वक़्त पर ही अदा की है।   अगर मशरूफियत या कोई और वजह हो तो एक आम सुन्नी मुस्लिम भी नमाज़ो को मिलाकर भी अदा कर सकते है। क्योंकि उसी हदीस में  अल्लाह के रसूल (ﷺ) से जब एक सहाबी ने पूछा कि आपने ये अमल क्यों किया तो रसूलल्लाह (ﷺ) ने जवाब दिया ताकि उम्मत को आसानी हो यानी ईबादत को आसान किया जाये।  अब आप खुद फैसला कर सकते है कि आपको अल्लाह के रसूल (ﷺ) की बात माननी है या किसी ऐसे ज़ाहिल मौलवी की बात माननी है।  



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